गवेषणा 2011 पृ-87

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चित्रकला में जो स्थान पोस्टर का है, वही शब्द के माध्यम से ध्यान आकर्षण करने वाले विज्ञापन का है। हमारे देश की कुल जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार एक करोड़ चौंसठ लाख तैंतालीस हजार पाँच सौ चालीस है। इसमें ग्रामीण जनसंख्या चौहत्तर करोड़ आठ लाख निन्यानवे हजार आठ सौ उन्नीस है तथा नगरीय जनसंख्या अठ्ठाइस करोड़ पचपन लाख तैंतालीस हजार सात सौ इक्कीस है।

अभी भी कस्बे और गाँव निरक्षरों से भरे पड़े हैं। वास्तव में साक्षर होने और शिक्षित में अंतर है। अत: केवल लिखित शब्द का सहारा लेने वाले विज्ञापन, पुस्तकाएँ, ब्रोश्यूर पत्र-पत्रिकाएँ आदि माध्यमों का प्रभाव बहुत सीमित है। नव साक्षरों और कम पढ़े लिखे लोगों का ध्यान रखकर विज्ञापन लिखने तथा चित्रित करने की दिशा में नित नूतन प्रयोगों की होड़–सी लगी हुई चारों ओर दिखाई देती है। प्राय: हम देखते हैं कि हिंदी में विज्ञापन सीधे अंग्रेजी से अनूदित होते हैं। उनका आधार शाब्दिक श्लेष है जैसे ‘अमूल’ मक्खन के अंग्रेजी विज्ञापन जो बड़े शहरों में बड़े होर्डिंग के रूप में प्रसारित होते हैं या प्रसाधनों के विज्ञापन या पंखों, स्कूटरों के विज्ञापन आदि या ऐसे ही अपने सामाजिक स्थिति–स्टेटस सिंबल, जैसे– फ्रिज, टी.वी., मिक्सी आदि या खास कपड़े, दामी पाड़िया या कारपेट आदि को बढ़ाने और प्रकारंतर से अंह–तृप्ति के लिए होते हैं। इनकी भाषा बहुत ही कृत्रिम और बनावटी होती है। नव तथा हीनभाव से ग्रस्त होता है। वह हिन्दी का विज्ञापन पढ़ता कहाँ है? प्रश्न है कि ये अंग्रेजी मिश्रित या अंग्रेजी से अनुदित हिंदी विज्ञापन होते किसके लिए हैं? क्या केवल किसी भी उद्योग में प्रचार-माध्यमों के लिए जो धनराशि निर्धारित होती है, वह केवल खर्च करने के लिए? कहा जाता है कि यह राशि करों से मुक्त होती है। हिंदी विज्ञापनों में अंग्रेजी के वर्चस्व के चलते आज भाषा का महत्व गौण हो गया है, हम कैसे लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल हों चाहे इसके लिए आधा तीतर आधा बटेर की तहर अंग्रेजी हिंदी मिक्सचर का ही घोल क्यों न जनता को पिलाना पड़े। जनता भी अब इन सब चीजों की इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि डी०डी०वन से लेकर स्टार वन, स्टार प्लस और आई.बी.एन. सेवन तक सारे विज्ञापनों को आत्मसात कर लेती है फिर भी भाषा का प्रश्न तो बना ही रहता है कि हम जनभाषा, मानक-भाषा या मिश्रित भाषा में से किसे ग्रहण करें।

जनभाषा या बोली का माध्यम महत्वपूर्ण है। हमारे ‘कृषि संसार’ या रेडियो पर ‘देहाती दुनिया’ आदि कार्यक्रम यथा-संभव बोली का आश्रय लेते हैं। kपरंतु उन कार्यक्रमों का प्रायोजन करने वाले हमारे बड़े शहरों के आकाशवाणी स्टूडियों में या मंडी हाउस के बाबुओं में बहुत कम उस स्त्रोत से परिचित होते हैं। कार्यक्रमों के बीच मे सुन्दर में स्वस्थ बालों का शैम्पू, महिला साक्षरता का प्रचार, शादी की सही उम्र, परिवार नियोजन तथा एड्स से बचाव का प्रचार, सभी कुछ फिल्मी मसाले की तरह भर दिया जाता है। इनके द्वारा भाषा-बोध और भावबोध की अपेक्षा चमत्कार बोध अधिक होता है। आस्ट्रेलिया में देहाती कार्यक्रम स्टूडियो में नहीं, खेतों खलिहानों में उसी स्थान पर जाकर किये जाते हैं। उनकी प्राथमिकता और आधिकारिता उसी यात्रा में अधिक होती है; परन्तु भारत में ऐसे याथार्थ कार्यक्रम सत्तारूढ़ों और प्रशंसकों को असुविधाजनक और आपत्तिजनक लगते हैं। ऐसे में प्रसारित होने वाले विज्ञापन और उनकी भाषा भी चाहे वह टूथपेस्ट का विज्ञापन हो या सफेदी की झंकार वाला अथव अन्य कोई विज्ञापन हो श्रोता को केवल प्रभाव-शून्य, शब्द चमत्कार तक ही आकृष्ट कर पाते हैं। सुनने वाला जानता है कि वह केवल व्यावसायिक विज्ञापन है, इसका कोई स्थायी महत्व नहीं है। पोलियो-ड्राप जैसी कुछ जीवनोपयोगी वस्तुओं को छोड़कर बाज़ारवादी-संस्कृति का ही अंग बन कर रह गई है, विज्ञापन की भाषा। लोकभाषा का लिखित मानक भाषा के साथ मिलाप और उसका तालमेल बहुत जरूरी है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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