नाश्ता मुझे आज भी याद है 2

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डॉ. जगन्नाथन ने जाते ही एक बड़ी चुनौती मेरे सामने रख दी कि बहुत समय से लम्बित व्याकरण की सिद्धान्त-व्यावहारिक पुस्तक की योजना को पूरा करूँ और मुझे आज भी खुशी है कि डॉ. चौहान, डॉ. बासुतकर और डॉ. सहाय के आत्मीय और विद्रवत्तापूर्ण सहयोग से मेरा यह कार्य पूरा हुआ।

अभी 14 जनवरी को डॉ. जगन्नाथन से वर्धा में भेंट हुई। वे उस बात को याद कर अब भी गदगद थे। संस्थान के हैदराबाद केंद्र में मेरा एक वर्ष बहुत अच्छा गुजरा। श्री जैन, सुभाश पाठक, हरिओम शर्मा, जाफर, नरसिंह राव आदि सभी साथियों ने मेरी पूरी सहायता की। हैदराबाद प्रवास में डॉ. राम निरंजन पांडे, एच. बी. कृष्णमूर्ति जैसे मनीषियों से भेंट हुई। द. भारत हिंदी प्रचार सभा में अध्यापन भी किया। हिंदी भाषा की दृष्टि से हैदराबाद उर्वर नगर है।

श्री तिरूपति बालाजी की कृपा से मैं रीडर के पद पर उदयपुर विश्वविद्यालय लौट आया। डॉ. जगन्नाथ जी की उदार सहृदयता को मैं भूल नहीं पाता। आते समय उन्होंने कहा- 'रीडर पद-भार ग्रहण करने के बाद मुझे सूचना देना, तब आपका त्यागपत्र आगरा भेजूँगा, लेक्चरर के पद पर मत जाना। डॉ. जगन्नाथन के साथ मेरे और भी आत्मीय संस्मरण हैं, जो अक्सर मेरे मानस पटल पर दस्तक देते रहते हैं। पाँच वर्ष उदयपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर एवं अध्यक्ष पद पर रहने के बाद 1984 में फिर संस्थान के आगरा केंद्र में मेरी नियुक्ति हिंदी भाषा और साहित्य के प्रोफेसर पद पर हो हुई। तब संस्थान शैक्षिक दृष्टि से अपने शिखर पर था। हालांकि संस्थान पहुँचने के साथ ही वहाँ के कर्मचारियों की गुटबाजी, संस्थान के शैक्षिक कार्यों को बाधित करने की प्रवृत्ति से मैं परिचित होने लगा था। पर डॉ. न. वी. राजगोपालन, डॉ. सुरेश कुमार, डॉ. मनोरमा गुप्ता और मैं स्वयं कर्मचारियों की गुटबंदी से अलग अपने कार्यों में लगे रहे। कैसा समय था, भारत के सभी अंचलों से छात्र सात दिवसीय शिविर में सम्मिलित होने आते थे। एक साथ भारत का एक लघु प्रतिरूप-सा हमारे सामने उपस्थित हो जाता था। डॉ. चौहान की प्रबंध कुशलता, डॉ. अश्वनी कुमार का व्यवस्था चातुर्य और समर्पण, डॉ. रामकृपाल कुमार व डॉ. रामकमल पांडे की अथक श्रमशीलता उस शिविर को मूर्त करती थी। इनमें से रामकमल पांडे तो आज भी संस्थान में हैं।

दूसरी बार संस्थान में जाना मिश्रित अनुभवों को लेकर सामने आया। कुछ लोग थे, जो पहले से जानते थे, उनकी आँखों में आनंद का भाव था, कुछ ऐसे थे-शायद अधिक-जिनकी आँखों में काँटे उग आए थे।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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