नाश्ता मुझे आज भी याद है 3

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मेरा तत्कालीन निदेशक से कुछ दूर और कुछ पास का संबंध था। तो यह स्वाभाविक था कि निदेशक के विरोधी मेरा भी विरोध करें। उन्हें मेरी योग्यता, निष्ठा और सामर्थ्य से कोई लेना-देना नहीं था, बस विरोध करना था। संस्थान के द्वार पर नारे लगाये गए, नित्य के कार्य को बाधित करने के भरसक प्रयत्न हुए, पर अपने स्वभाव की उद्दण्डता के कारण मैंने उनकी कभी परवाह नहीं की। मेरे अध्यापन की क्षमता से परिचित होकर मेरे मित्र बने डॉ. अश्वनी, डॉ. पाण्डेय, डॉ. कुमार और डॉ. चौहान ने मेरी हर गतिविधि में दिल से योग दिया। उन दिनों 15 दिन में एक बार शैक्षणिक गतिविधि के रूप में भाषण चर्चा आदि का कार्यक्रम भी प्रारंभ किया गया था। शायद जाँचने परखने या फिर नीचा दिखाने के लिए संयोजक ने मुझसे भाषण के लिए कहा, मैंने दिया। अचरज की बात यह है कि हैदराबाद प्रवास के समय मेरे प्रति स्नेहिल रहे एक श्रोता ने मुझसे कहा, "आपका भाषण तो सिर से गुजर गया।" दूसरी बार के इस दौर में मुझे डॉ. महेन्द्र सिंह राणा (अब प्रोफेसर) डॉ. सतवीर सिंह, डॉ. भरत सिंह, डॉ. अशोक, डॉ. सुधीर, डॉ. राजबाली पाठक, जैसे नवयुवक सहकर्मियों का अपूर्व सहयोग मिला। मैं इसे कभी भुला नहीं सकता।

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संस्थान में मुझे सदैव लघु भारत का आभास होता था। सिक्किम, मणिपुर, मिजोरम से लगाकर केरल और कर्नाटक के छात्र संस्थान में आते थे। मुझे उन्हें देखकर 'माईग्रेटोरी' पक्षियों की याद हो आती थी। ये छात्र आते, 8-10 महीने रुकते, अपने-अपने प्रदेश की संस्कृति की खुशबू बिखेरते, संस्थान को रंगों से बुनते और चले जाते। पीछे रह जाती अदृश्य होती हुई भी साकार स्मृतियाँ। संस्थान भारत का अपूर्व सांस्कृतिक मिलन केंद्र है। मैंने संस्थान के परिवेश को शिद्दत के साथ जिया। 1988 में मुझे हैदराबाद केंद्र भेज दिया गया, मैसूर केंद्र भी मेरे ही पास था। हैदराबाद का शैक्षिक, भाषिक और सांस्कृतिक परिवेश उदार किंतु दृढ़ था। वहाँ काम किया जा सकता था, मैंने किया भी। दक्षिण के भीतरी अंचलों में जाने का सुअवसर यहीं मिला। भाषा की भिन्नता कभी बाधक नहीं बनी। इस अंचल के हिंदी अध्यापक अधिक शिष्ट और सहृदय हैं। भारत के इस दक्षिण अंचल की वायु में घुली कॉफी की ताजा सुगंध मेरे मानस को इस समय भी, तरंगायित कर रही है। कर्नाटक प्रदेश की लाल माटी, लहराते खेत और कद में छोटे किंतु फलों से लदे आम के पेड़ मानस में जीवंत हो रहे हैं।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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