श्रीलंका की पाती...! 2

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श्रीलंका के कोलंबो में स्थापित भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में सिंहली विद्यार्थियों के लिए सन 2007 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों का शुभारंभ हुआ। तब तक कई वर्षों से भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों पर सिंहली विद्यार्थियों को तैयार किया जाता था। भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में अध्यापिका के पद पर नियुक्त रहने के कारण मुझे भी उन पाठ्यक्रमों से अवगत होने का अवसर मिला था।


प्रतिवर्ष हमारे विद्यार्थी छात्रवृत्ति पर केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा जाते ही हैं, अत: सर्वप्रथम वहाँ जाना मैंने उचित समझा और निदेशक प्रो. महावीर शरण जैन जी को दूरभाष पर सूचित करते हुए आगरा पहुँचने की तिथि बताई। दूसरे दिन मैं अपने पति के साथ संस्थान में पहुँची तो निदेशक जी तथा विदेशी विभाग की हिंदी शिक्षक मंडली ने हमारा स्वागत किया।

सर्वप्रथम हमारी भेंट केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के अंतर्राष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग के प्रभारी तथा वहाँ के ज्येष्ठ प्रवक्ता डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ जी से हुई। हम लोगों के परस्पर परिचय के पश्चात मैंने अहिंदी भाषी सिंहली छात्रों के लिए हिंदी शिक्षण संबंधी अपनी समस्याओं तथा अपने पहलुओं को उनके सम्मुख रखा। उन्होंने लगभग दो-तीन घंटे तक का अपना अमूल्य समय हमें देते हुए बड़े प्रेम से हिंदी के उच्चारण, व्याकरण, वर्तनी तथा भाषा संबंधी अनेक समस्याओं का समाधान किया। उनके एक-एक शब्द टेप में सुरक्षित हैं।

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मुझे श्रीलंका के अपने विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा एवं साहित्य के अतिरिक्त उत्तर भारतीय संस्कृति तथा हिंदी लोक साहित्य भी बी.ए. ऑनर्स के छात्रों को पढ़ाने पड़ते थे। अत: इन विषयों के लिए वहाँ की ज्येष्ठ प्रवक्ता डॉ. श्रीमती सुभद्रा शर्मा जी से हमारा परिचय कराया गया। उन्होंने अनेक पहलुओं पर चर्चा करते हुए अनेक ऐसी बातें हमें बताईं, जो मेरे लिए बिल्कुल नई थीं। उन्होंने हिंदी भाषा एवं भारतीय संस्कृति से सम्बद्ध अनेक नई-नई बातों से मुझे अवगत कराया।

इस अवसर पर डॉ. ठाकुरदास जी भी अविस्मरणीय हैं। उन्होंने द्वितीय तथा विदेशी भाषा के रूप में किस प्रकार हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए तथा किस ढंग से शिक्षण सामग्री तैयार की जानी चाहिए, इन सब विषयों पर विस्तारपूर्वक बहुत-सी अमूल्य बातें बताईं।

सन 2006 में श्रीलंका में स्थापित भारतीय उच्चायोग के साथ चर्चा हेतु केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की विद्वद् मंडली का आगमन हुआ। उस समय मैं श्रीलंका के कॅलणिम विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की अध्यक्ष थी, और भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में भी हिंदी का अध्यापन करती थी।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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