स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-134

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वाक्य के अंतर्गत यदि परसर्गीय पदबंधों की स्थिति का अवलोकन करें तो ज्ञात होता है कि संज्ञा पदबंध में परसर्ग का प्रयोग वैकल्पिक होता है। वाक्यांतर्गत परसर्गीय संज्ञा पदबंध मूलत: उद्देश्य के प्रकार्य स्थान पर आते हैं। उद्देश्य के प्रकार्य–स्थल पर प्रयुक्त होकर ये पदबंध भिन्न–भिन्न क्रियाओं तथा क्रिया–रूपों के साथ भिन्न–भिन्न प्रकार की अभिरचनाएँ प्रस्तुत करते हैं। वाक्य में क्रिया की अन्विति भी ‘ø’ संज्ञा–पदबंध से होती है, अर्थात यदि उद्देश्य ‘ø’ पदबंध है तो क्रिया उस से अन्वित होगी; यदि ‘उद्देश्य’ शून्येतर पदबंध है तो क्रिया ‘मुख्य कर्म’ से अन्वित होगी; यदि ‘मुख्य कर्म’ भी शून्येतर पदबंध है तो क्रिया ‘कर्म पूरक’ से अन्वित होगी। जिस वाक्य में कर्म पूरक न हो तथा उद्देश्य और मुख्य कर्म दोनों शून्येतर पदबंध हो, वहाँ क्रिया तटस्थ होगी–सदैव पुल्लिंग एकवचन में।

इसी प्रकार किसी भी वाक्य में ‘कर्ता’ केवल ‘उद्देश्य’ के स्थान पर आता है, शेष सभी कारक विधेय होते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि ‘कर्ता’ और ‘उद्देश्य’ दोनों किसी भी वाक्य में एक ही होते हैं, उदाहरणार्थ-

(i) राम ने रावण को मारा।

इसमें कर्ता ‘राम ने’ है, तथा उद्देश्य भी ‘राम ने’ ही है।

पुन: कारक व्यवस्था में ‘कर्ता’ ‘नें’ परसर्ग लेता है और ‘कर्म’ ‘को’ परसर्ग किंतु उल्लेखनीय तथ्य यह है कि केवल ये ही दोनों कारक अर्थात ‘कर्ता’ और ‘कर्म’ ही ‘ø’ परसर्ग भी लेते हैं, शेष ‘करण’, ‘संप्रदान’, ‘अपादान’ एवं ‘अधिकरण’ कभी भी ‘ø’ परसर्ग से व्यक्त नहीं हो सकते। वाक्य में ज्यों ही इनका प्रयोग होता हैं, परसर्गीय चिह्न इनके साथ अवश्य जुड़ जाता है।

4. निष्पत्ति- उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जाता है कि-

  • जब कर्ता/उद्देश्य ‘ने’ परसर्गीय पदबंध बनाता है तो उससे क्रिया की अन्विति नहीं होगी, क्योंकि क्रिया की कर्ता के साथ अन्विति केवल तभी होती है, जब वह ‘ø’ पदबंध होता है।
  • जब किसी वाक्य में ‘कर्ता/उद्देश्य’ ओर ‘कर्म’ दोनों शून्येतर पदबंध अर्थात क्रमश: ‘ने’ और ‘को’ परसर्ग से युक्त हों तथा कर्मपूरक का अभाव हो तो क्रिया की स्थिति तटस्थता की कर्म के साथ अन्विति तभी होती है जब-

(i.) कर्ता शून्येतर पदबंध से युक्त हो, या
(ii) क्रिया भूतकाल में हो, या
(iii) वाक्य कर्मवाच्य में हो या अकर्तृवाच्य में हो।

संदर्भ ग्रंथ
  1. डॉ. सिंह, सूरजभान (2000) हिंदी का वाक्यात्मक व्याकरण, दिल्ली : साहित्य सहकार, पृष्ठ–40
  2. कर, चितरंजन (2006) हिंदी परसर्ग, दिल्ली : बी. आर. पब्लिशिंग कारपोरेशन, पृष्ठ–165–166

संपर्क सूत्र-
शोध छात्र, भाषा प्रौद्योगिकी विभाग, भाषा विद्यापीठ
महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र
ई-मेल – [email protected]

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