स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-136

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नागालैंड की मुख्य जातियाँ हैं– अंगामी, आओ, छाकेसाङ, चाङ, कोन्याक, खियाम्न्युंगाम, लोथा, फोम, पोचुरी, रेङमा, साङतम, सेमा, यिम्चुङर एवं जेलियाङ। इसके अलावा कुकी, कछारी, गारो, गोर्खा लोग भी पहले से ही निवास करते आ रहे हैं।

नागाओं की विभिन्न प्रकार की पारंपरिक संस्कृति है जो विश्व में जानी जाती है। सरमुण्डों की परंपरा नागाओं में प्रख्यात रही हैं, पर बदलते हुए सभ्यता के कारण इस बुरी प्रथा का अंत हो चुका है। नागाओं की प्रत्येक जातियों की अपनी ही अलग पहचान की बोली–भाषा, परंपरा एवं त्योहार होते हैं। नागाओं की समानता पर देखा गया है कि इनके ऊपर राजाओं का शासन कभी नहीं रहा। गाँव का मुखिया ही प्रशासनिक कार्य संभालता था। केवल कोन्याक जाति में बहुत से गाँव को मिलाकर एक आँग (राजा) हुआ करता था। वह प्रशासन करता था। नागा लोग ईसाई धर्म अपनाने से पहले आत्माओं की पूजा में आस्था रखते थे। तंत्र–मंत्र का भी प्रचलन हुआ करता था।

अमेरिकी ईसाई मिशनरी के आगमन के पूर्व औपचारिक शिक्षा का प्रचलन नहीं था। सभी प्रकार के शिक्षण–प्रशिक्षण मौखिक रूप में ही हुआ करते थे। यह प्रथा पूर्वजों से चली आ रही थी। सभी प्रकार के सामूहिक प्रशिक्षण मोरूंग (ऐसेंब्ली) के जरिए होते थे। लिखित पुस्तकों के बारे में लोगों को जानकारी नहीं थी। औपचारिक रूप से शिक्षा तथा साहित्यिक कार्य क्रिश्चियन मिशनरी के आगमन के पश्चात ही शुरू होता है। अन्य सभ्यता की तरह गुरू प्रथा नागाओं में नहीं पाई जाती। मंगोलीय वर्ग के अन्य लोग जैसे- मणिपुरी, असमिया, भोटीया, नेपालियों की तरह नागाओं का संबंध हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध एवं जैनियों से नहीं रहा। ब्रिटिश सरकार द्वारा पहली बार 1839 से 1841 के अवसर पर अंगामी क्षेत्रों में प्रवेश करने के लिए अभियान चलाया गया। अंगामियों द्वारा ब्रिटिश कैंप पर आक्रमण करने के कारण उन्हें प्रताड़ना देने हेतु यह अभियान चलाया गया था।

अमेरिकी मिशन द्वारा शान जाति एवं बर्मा के लोगों के बीच क्रिश्चियन संदेश प्रसारण हेतु असम के सदिया एवं तत्पश्चात शिवसागर में क्रिश्चियन मिशन केंद्र की स्थापना की गई थी। इस अवसर पर मिशनरियों का संबंध नामसाङ ग्रामीणवासियों से हुआ। इसी नामसाङ भाषा में सर्वप्रथम नागा लिखित साहित्य का आरंभ हुआ था। यह एक शब्द कोश एवं कैटकिस्म (प्रश्नोत्तरी) था। गाँव वालों के विरोध के बावजूद गाँव के मुखिया एवं उसके लड़के ने लिखने–पढ़ने जैसे नए कार्य देखते हुए उन्हें रहने और कार्य करने के लिए अनुमति दे दी। उस गाँव का एक युवक पढ़ने–लिखने में दिलचस्पी लेता था और उसने क्रिश्चियन विश्वास को ग्रहण कर लिया। वहाँ पर एक स्कूल भी खोला गया, जहाँ पर 20 विद्यार्थी पढ़ने लगे। यह सब प्रक्रिया 1838 से 1842 के बीच चल रहा था। परंतु गाँव में रोग फैलने एवं बीमारी के कारण मिशनरी चले गए और स्कूल भी बंद हो गया।

तकरीबन 30 वर्ष के बाद 1872 में शिवसागर से गोधुला नामक एक धोबी के लड़के को ई. डब्लू. क्लॉर्क द्वारा अन्वेषण हेतु हाईमोंङ गाँव में भेजा गया। वहाँ पर गाँव के कुछ लोगों ने ईसाई मत को अपना लिया। परंतु आस्था एवं विश्वास की भिन्नता के कारण हाईमोङ गाँव में ईसाई लोग नहीं रह सके और मोलुङ (मोलुङकिमोङ) नामक एक नये गाँव का सृजन हुआ। वहाँ पर गोधुला एवं क्लॉर्क का संबंध सुपोङमेरेन नामक व्यक्ति से हुआ जो सबसे पहला नागा पढ़ा–लिखा व्यक्ति बन गया। नागाओं का पहला पठन–पाठन भजन एवं प्रभु-प्रार्थना से प्रारम्भ हुआ।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
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1. संस्कृति के महानायक भूपेन हज़ारिका का महाप्रस्थान डॉ. नवकांत शर्मा 1
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3. आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन हज़ारिका के गीत थे श्री रविशंकर रवि 17
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6. डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीतों में समाज संहति और संप्रीति का प्रस्फुटन श्री अखिल चंद्र कलिता 25
7. असम के सांस्कृतिक दूत भूपेन हज़ारिका डॉ. माधवेन्द्र 29
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लोकगीत संकलन एवं भाषांतरण
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2. श्रीमती इंदिरा : एक शोक गीत (मिजो भाषा से) मूल स्व. (श्रीमती) ललसाङजुआली साइलो 50
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लिंग की सच्चाई भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
मौलिक
1. खासी राजा शहीद उतिरोत सिंह डॉ. (श्रीमती) फिल्मिका मारबनियाङ 52
2. त्रिपुरेश्वरी का त्रिपुरा सुश्री खुमतिया देबबर्मा 53
3. सूख रहे दुनिया के प्राण श्री लालसा लाल ‘तरंग’ 54
4. अवश्य साथ देना डॉ. सीताराम अधिकारी 55
5. फूल सुश्री उमा देवी 56
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मौलिक
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आलेख
संस्कृति और समाज
1. कारबि समाज का प्राचीन शैक्षिक डॉ. (श्रीमती) जूरि देवी 79
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2. हिंदी के विकास में मानस का योगदान डॉ. राजेन्द्र परदेसी 120
3. पूर्वोत्तर भारत की भाषाएँ और संस्कृत–हिंदी का संबंध प्रो. शंभुनाथ 122
4. पूर्वोत्तर भारत में हिंदी : विकास की संभावनाओं का मूल्याँकन सुश्री एल. डिम्पल देवी 127
5. हिंदी परसर्गीय पदबंध श्री चंदन सिंह 131
6. नागा भूमि एवं हिंदी प्रचार–प्रसार की स्थिति डॉ. वी.पी. फिलिप जुविच 135
7. नोक्ते जनजाति की मौखिक लोक साहित्य की लेखन समस्या देवनागरी लिपि एक समाधान डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय 140
तुलनात्मक अंतरण
1. मोहन राकेश और ज्योति प्रसाद अगरवाला के नाटक श्री अमरनाथ राम 149
2. असमिया उपन्यासकार विरिंचि कुमार बरूआ और प्रेमचंद के उपन्यासों की नायिकाएँ श्री आब्दुल मतिन 154
3. प्रेमचंद एवं शरतचंद्र के कथा–साहित्य में स्त्री पात्र डॉ. दिनेश कुमार चौबे 157
समालोचन
1. हिंदी यात्रा साहित्य को नागार्जुन का प्रदेय डॉ. श्यामशंकर सिंह 162
2. स्वातंव्योत्तर हिंदी कविता में बदलती प्रणयानुभूति डॉ. (श्रीमती) अनीता पंडा 169
3. जातीय स्वाभिमान : दलित कहानियों के विशेष संदर्भ में सुश्री उमा देवी 175
4. जनजातीय हिंदी उपन्यास : परिचयात्मक विवेचन सुश्री खुमतिया देबबर्मा 179
भाषा-शिक्षण
1. मिज़ोरम और हिंदी शिक्षण डॉ. (श्रीमती) लुईस हाउनहार 185
2. हिंदी शिक्षण की समस्याएँ : सिक्किम के संदर्भ में श्रीमती छुकी लेप्चा 190
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1. डाक की उक्तियाँ और असमिया लोकजीवन में उसका प्रभाव सुश्री नंदिता दत्त 192
2. मणिपुरी लोकसाहित्य : एक पूर्वावलोकन डॉ. (श्रीमति) बेमबेम देवी 197
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1. अरुणाचल प्रदेश का इतिहास लेखन डॉ. राजेश वर्मा 201
2. मदन-कामदेव मंदिर : असम का खजुराहो श्रीमति काकोली गोगोई 204
व्यक्तित्व
1. स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना कनकलता बरूआ श्री अखिल चंद्र कलिता 206
2. महाराज कुमारी विम्बावती मंजरी : मणिपुरी मीरा प्रो. जगमल सिंह 208
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