स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-18

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उन्होंने हिंदी फ़िल्म जगत को काफ़ी कुछ दिया और लता जी जैसी महान गायिका से असमिया गीत गवा लिया। वे अपनी धुन में काम करते रहे। उनका एक सफल गीत उनकी शख्सियत को मुकम्मल तौर पर बयाँ करता रहा 'आमि एक जाजाबोर...' मैं एक 'यायावर' हूँ और उनकी 'यायावरी' उनके संगीत को जीनत अता करती रही, और यह सब संगीत को लेकर उनके दीवानेपन की वजह से ही संभव हुआ। एक भेंट में उन्होंने कहा था- संगीत मेरे लिए सिर्फ मनोरंजन की चीज़ नहीं रही, गीत सामाजिक बदलाव का कारगर हथियार हो सकते हैं। मैंने जब इप्टा ज्वाइन किया था, तब यही बात दिमाग में थी। वह दौर अंग्रेज़ हुकूमत की मुखालफत का दौर था। रित्विक घटक और मृणाल सेन, सिनेमा के माध्यम से अपनी बात कह रहे थे, उत्पल दत्त रंगमंच के जरिए लोगों तक पहुंच रहे थे और कैफी आजमी कलम का सहारा ले रहे थे। लिहाजा मैंने संगीत को चुना। दरअसल मेरा मानना है कि तीन मिनट का एक गीत भी क्रांति कर सकता है', और वाकई भूपेन दा ने इसे सच कर दिखाया। अपनी जमीन की उपेक्षित जनजातियों की आवाज़ को उन्होंने बुलंद किया। आज सिर्फ भूपेन दा की वजह से ही पूर्वोत्तर जनजातियों के वजूद को शिनाख्त हासिल हो सकी है। नि:संदेह 'दादा साहेब फालके सम्मान' इसी शिनाख्त को प्रमाणिक बना गया। खैर, इससे इतर फिर हम प्रवेश करते हैं, उनकी सांगीतिक यात्रा के क्रम में हिंदी फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में।

उनकी जिद थी कि खुद भी आंचलिक शब्दों को गुनेंगे–बुनेंगे और गीतकारों से भी बुनवाएंगे। रूदाली के गीतों ने भूपेन दा को एक बार फिर बॉलीवुड में शीर्ष पर पहुँचा दिया। भूपेन दा ने असम की धुनों को उसमें प्रयुक्त कर पूरे हिंदुस्तानियों के दिलों पर राज कर लिया।

'दिल हूम...हूम करेऽऽ' गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। 'रूदाली' फ़िल्म को लेकर जहाँ भी समालोचकों ने चर्चा की, वहाँ पर संगीत और गीत पक्ष पर ही सबसे ज़्यादा मूल्यांकन हुआ। कहने का तात्पर्य यह है कि कथ्य पक्ष पर संगीत पक्ष हावी रहा। 'रूदाली' फ़िल्म के परिवेश को गौर से देखें तो आप स्पष्ट अनुभव करेंगे कि राजस्थान की तपती बालू में भी भूपेन हजारिका ने असम को लाने की भरपूर कोशिश की है। यह दखलंदाजी रेतीले प्यासी संस्कृति को कैसे भा गई, यह तो आज भी आश्चर्य का विषय बना हुआ है।

मेरे ख्याल से गीतकार गुलजार के वे भावुक शब्द शक्ति हैं, जो अपनी ध्वनि से राजस्थान की संस्कृति को बड़ी बहन मान गले लगा जाती है। नि:संदेह बिंब प्रधान गुलजार के गीतों के शब्द पंखुड़ी में ताजगी का एहसास मन में कौतुहल उत्पन्न करने वाला है।

इस वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत उनकी रचनाओं को एकत्रित करके संकलित करने की है। उनकी कविताओं, पत्रों और अन्य कृतियों का संकलन करना ज़रूरी है। भूपेन दा हमेशा 'यायावर' की तरह जीते रहे। इसलिए उनकी रचनाएँ बिखरी हुई हैं। उन्हें एक जगह समेट कर उसका प्रकाशन होना चाहिए। लेकिन प्रकाशन सर्वसुलभ और सस्ती होनी चाहिए, ताकि हर कोई खरीद सके। इस दिशा में असम साहित्य सभा विशेष भूमिका का निर्वाह कर सकती है और उसे करना भी चाहिए। भूपेन दा के गाए या लिखे गीत भी बिखरे हुए हैं। उन्हें भी सीडी के माध्यम से हर किसी के लिए उपलब्ध किया जाना चाहिए। इसके लिए 'भूपेन हजारिका स्मारक ट्रस्ट' को पहल करनी चाहिए। ताकि वे गाए सीडी हर किसी को आसानी से उपलब्ध हो सके। मतलब साफ है कि भूपेन हजारिका से जुड़ी सामग्रियाँ सहज उपलब्ध हो सकें। भूपेन दा की विशाल समाधि बने, सड़कों और भवनों का नामकरण उनके नाम पर हो, लेकिन इसके साथ ही उनके रचना संसार को आम आदमी के लिए उपलब्ध कराना भी ज़रूरी है। डॉ. भूपेन हजारिका का अपना जीवन दर्शन था। समाज को देखने का उनका अपना नज़रिया था। वे हर किसी को आगे बढ़ता देखना चाहते थे। इस पर केंद्र करके एक प्रमाणिक पुस्तक की ज़रूरत भी महसूस की जा रही है।

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समन्वय पूर्वोत्तर अक्टूबर-दिसम्बर 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संगीत-साहित्य के महाप्राण हज़ारिका का महाप्रयाण : विशेष आलेख
1. संस्कृति के महानायक भूपेन हज़ारिका का महाप्रस्थान डॉ. नवकांत शर्मा 1
2. भूपेन हज़ारिका का जीवन दर्शन और व्यक्तित्व डॉ. दिलीप मेधि 4
3. आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन हज़ारिका के गीत थे श्री रविशंकर रवि 17
4. सुधाकंठ डॉ. भूपेन हज़ारिका : असमिया जाति के अलिखित दस्तावेज डॉ. प्रवीन कोच 19
5. असमिया संगीत और डॉ. भूपेन हज़ारिका श्री गौतम पातर 22
6. डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीतों में समाज संहति और संप्रीति का प्रस्फुटन श्री अखिल चंद्र कलिता 25
7. असम के सांस्कृतिक दूत भूपेन हज़ारिका डॉ. माधवेन्द्र 29
8. असम रत्न डॉ. भूपेन हज़ारिका की कुछ अनमोल रचनाएँ भाषांतरण सुश्री नन्दिता दत्त 33
9. डॉ. भूपेन हज़ारिका का निधन... कलाक्षेत्र की एक अपूर्णीय क्षति श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’ 37
लोकमानस
लोककथा संकलन एवं भाषांतरण
1. राङगोला (कॉकबरक भाषा से) सुश्री रूपाली देबबर्मा 38
2. तीन भाई और एक बहन (पनार भाषा से) डॉ. संतोष कुमार 39
3. झील का रहस्य (ताङसा भाषा से) सुश्री मैखों मोसाङ 40
4. कोरदुमबेला (मिजो भाषा से) श्री एच. वानलललोमा 42
5. जायीबोने (गालो भाषा से) सुश्री किस्टिना कामसी 43
लोकगीत संकलन एवं भाषांतरण
1. कोम जनजाति के पारंपरिक गीत (मणिपुर से) सुश्री टी. जेलेना कोम 44
2. का तिङआब (कौआ) (खासी भाषा से) श्रीमती जीन एस. ड्खार 47
कथा-मंजरी
भाषांतरित
1. प्रगति–गान (असमिया भाषा से) मूल श्री उमेश वैश्य 49
भाषांतरण श्रीमती काकोली गोगोई 49
2. श्रीमती इंदिरा : एक शोक गीत (मिजो भाषा से) मूल स्व. (श्रीमती) ललसाङजुआली साइलो 50
भाषांतरण श्री एच. वानलललोमा 50
दो कविताएँ
1. The Heart मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
हृदय भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
2. The Truth of Gender मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
लिंग की सच्चाई भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
मौलिक
1. खासी राजा शहीद उतिरोत सिंह डॉ. (श्रीमती) फिल्मिका मारबनियाङ 52
2. त्रिपुरेश्वरी का त्रिपुरा सुश्री खुमतिया देबबर्मा 53
3. सूख रहे दुनिया के प्राण श्री लालसा लाल ‘तरंग’ 54
4. अवश्य साथ देना डॉ. सीताराम अधिकारी 55
5. फूल सुश्री उमा देवी 56
6. मंच सुश्री विनीता अकोइजम 56
कथा-मंजरी भाषांतरित
1. श्रृंखल मूल डॉ. (श्रीमती) रूपश्री गोस्वामी 57
भाषांतरण सुश्री राजश्री देवी 57
मौलिक
1. गुरु–दक्षिणा श्री संजीब जायसवाल ‘संजय’ 60
2. नई सुबह श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’ 66
3. तीन लघु प्रेरक कथाएँ डॉ. अकेलाभाइ 69
ललितनिबंध-मंजरी
1. बादलों को उतरने के लिए थोड़ी जगह दें' डॉ. अरूणेश ‘नीरन’ 72
2. पागल यौवन का विप्लवकारी महानर्तव डॉ. भरत प्रसाद 74
आलेख
संस्कृति और समाज
1. कारबि समाज का प्राचीन शैक्षिक डॉ. (श्रीमती) जूरि देवी 79
अनुष्ठान : जिरकेदाम (जिरछङ)
1. मणिपुरी संस्कृति की आधार भूमि मणिपुरी रास : प्रो. एच. सुवदनी देवी 86
2. दानवीर बलि के वंशज श्री शेखर ज्योतिशील 91
3. पूर्वोत्तर भारत की भाषा और संस्कृति पर अनुसंधान की असीम संभावनाएँ डॉ. संतोष कुमार 95
भक्ति-दर्शन
1. हिंदी एवं असमिया भक्ति काव्य समरूपता का सबल पक्ष : राष्ट्र के भावात्मक डॉ. राधेश्याम तिवारी 101
भाषा-चिंतन
1. हिंदी के प्रति दृष्टि – गांधी की डॉ. दिलीप मेधि 109
2. हिंदी के विकास में मानस का योगदान डॉ. राजेन्द्र परदेसी 120
3. पूर्वोत्तर भारत की भाषाएँ और संस्कृत–हिंदी का संबंध प्रो. शंभुनाथ 122
4. पूर्वोत्तर भारत में हिंदी : विकास की संभावनाओं का मूल्याँकन सुश्री एल. डिम्पल देवी 127
5. हिंदी परसर्गीय पदबंध श्री चंदन सिंह 131
6. नागा भूमि एवं हिंदी प्रचार–प्रसार की स्थिति डॉ. वी.पी. फिलिप जुविच 135
7. नोक्ते जनजाति की मौखिक लोक साहित्य की लेखन समस्या देवनागरी लिपि एक समाधान डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय 140
तुलनात्मक अंतरण
1. मोहन राकेश और ज्योति प्रसाद अगरवाला के नाटक श्री अमरनाथ राम 149
2. असमिया उपन्यासकार विरिंचि कुमार बरूआ और प्रेमचंद के उपन्यासों की नायिकाएँ श्री आब्दुल मतिन 154
3. प्रेमचंद एवं शरतचंद्र के कथा–साहित्य में स्त्री पात्र डॉ. दिनेश कुमार चौबे 157
समालोचन
1. हिंदी यात्रा साहित्य को नागार्जुन का प्रदेय डॉ. श्यामशंकर सिंह 162
2. स्वातंव्योत्तर हिंदी कविता में बदलती प्रणयानुभूति डॉ. (श्रीमती) अनीता पंडा 169
3. जातीय स्वाभिमान : दलित कहानियों के विशेष संदर्भ में सुश्री उमा देवी 175
4. जनजातीय हिंदी उपन्यास : परिचयात्मक विवेचन सुश्री खुमतिया देबबर्मा 179
भाषा-शिक्षण
1. मिज़ोरम और हिंदी शिक्षण डॉ. (श्रीमती) लुईस हाउनहार 185
2. हिंदी शिक्षण की समस्याएँ : सिक्किम के संदर्भ में श्रीमती छुकी लेप्चा 190
लोक-जीवन
1. डाक की उक्तियाँ और असमिया लोकजीवन में उसका प्रभाव सुश्री नंदिता दत्त 192
2. मणिपुरी लोकसाहित्य : एक पूर्वावलोकन डॉ. (श्रीमति) बेमबेम देवी 197
इतिहास
1. अरुणाचल प्रदेश का इतिहास लेखन डॉ. राजेश वर्मा 201
2. मदन-कामदेव मंदिर : असम का खजुराहो श्रीमति काकोली गोगोई 204
व्यक्तित्व
1. स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना कनकलता बरूआ श्री अखिल चंद्र कलिता 206
2. महाराज कुमारी विम्बावती मंजरी : मणिपुरी मीरा प्रो. जगमल सिंह 208
लघु यात्रा-संस्मरण
1. एक नदी द्वीप में विकसित विशाल संस्कृति श्री अतुलेश्वर 212
साक्षात्कार
1. लेखक लिखे नहीं पढ़े भी साक्षात्कारकर्त्री : एन. कुंजमोहन सुश्री धनपति सुखाम 214
पुस्तक-समीक्षा
1. अज्ञेय के रचनाकर्म का एक अनछुआ पहलू समीक्षक “अज्ञेय और पूर्वोत्तर भारत” डॉ. जयसिंह ‘नीरद’ 218


वैयक्तिक औज़ार

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