गवेषणा 2011 पृ-28

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इन विभिन्न क्षेत्रों को आधार बनाते हुए 'प्रयोजनमूलक' हिंदी के स्वरूप-निर्धारण हेतु, उसके विभिन्न भाषा-रूपों की चर्चा की जाती है, जैसे-
  1. वाणिज्य-व्यापार सम्बद्ध हिंदी - जिसमें विभिन्न बाजार-मंडियों, बाजार-दलालों, सट्टा-बाजार आदि का भाषा रूप सम्मिलित है।
  2. कार्यालय हिंदी - जिसमें विभिन्न सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यालयों तथा प्रशासन से सम्बद्ध भाषा-रूप सम्मिलित है।
  3. तकनीकी हिंदी - जिसमें विभिन्न तकनीकी विषयों, विभिन्न क्षेत्रों/विभागों जैसे- इंजीनियरिंग, कारपैन्टरी, लुहार-कार्य, प्रैस, फैक्टरी, मिल आदि के कार्यों के सैद्धान्तिक तथा प्रयोगिक क्षेत्रों सक सम्बद्ध भाषा रूप सम्मिलित है।
  4. समाजशास्त्रीय हिंदी - जिसमे समाजशास्त्र या समाज विज्ञान से सम्बद्ध उच्चस्तरीय विषयों जैसे- दर्शनशास्त्र, योगशास्त्र, ज्योतिशास्त्र, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, काव्यशास्त्र आदि विषयों के प्रस्तुतीकरण से सम्बद्ध भाषा रूप सम्मिलित हैं।
  5. साहित्यिक हिंदी - जिसमें आनन्ददायक उच्च स्तरीय साहित्य की विभिन्न विद्याओं जैसे-कविता, कहानी, नाटक, समालोचना, निबंध आदि के प्रस्तुतीकरण से सम्बद्ध भाषा-रूप सम्मिलित है।

आज का युग विज्ञान और तकनीक का युग है। भारत भी विज्ञान और तकनीक के विकास से जुड़ा हुआ है। यहाँ भी विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा का ही वर्चस्व है। पर हिंदी भी इस क्षेत्र में तेजी के साथ पर्दापण कर रही है। इस क्रम में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली का निर्माण और निर्धारण किया जा रहा है। वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग के तत्वावधान मे यह कार्य तेजी से सम्पन्न किया जा रहा है। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हिंदी में भी लेखन किया जा रहा है। हिंदी के माध्यम से विद्यार्थियों को विज्ञान की शिक्षा दी जा रही है। इस क्षेत्र में हिंदी ने काफी प्रगति की है, पर अभी उसे लम्बा रास्ता तय करना है।

आज हर विषय का व्यवहार-क्षेत्र में एक खास तरह के भाषा-रूप का प्रयोग होता है जो उस विषय या व्यवहार-क्षेत्र की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार विकसित होता है। इस भाषा-रूप को तकनीकी भाषा या 'प्रयुक्ति' कहते हैं, जैसे-कार्यालय की भाषा, बैकिंग की भाषा, पत्रकारिता की भाषा, विज्ञान की भाषा आदि। यहाँ हम वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा का स्वरूप

जब हम 'वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा' की बात करते हैं तो हमारे मन में सहज यह प्रश्न उठता है कि क्या 'वैज्ञानिक' भाषा-रूप और ‘तकनीकी’ भाषा–रूप एक ही हैं या ये दो अलग भाषा-रूप हैं। क्या कोई ऐसी भी वैज्ञानिक भाषा हो सकती है, जो तकनीकी भाषा न कही जा सकती हो, या इसके विपरीत, क्या तकनीकी भाषा वैज्ञानिक-भाषा नहीं हो सकती?

सामान्यत: विज्ञान विषयों मे प्रयुक्त होने वाले भाषा-रूप को हम वैज्ञानिक भाषा कहते हैं। इसे हम विज्ञान भाषा भी कह सकते हैं। विज्ञान की भाषा में आपको ऐसे शब्द, वाक्यांश या वाक्य-रूप मिलेगें, जिनका अर्थ संबद्घ विज्ञान-विषय के संदर्भ में विशिष्ट होता है, जिसे उस विषय का जानकार या विशेषज्ञ ही समझ सकता है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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